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जटिल चुनावी प्रश्न बना उत्तर प्रदेश

राजकुमार सिंह

दशकों तक देश की राजनीति को दिशा देने वाला उत्तर प्रदेश अरसे बाद खुद चुनावी दिशा भ्रम का शिकार नजर आ रहा है। देश में सर्वाधिक (80) लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए इस बार सात चरणों में मतदान हो रहा है। मतदान के चार चरणों में 231 यानी कि आधी से अधिक सीटों के लिए मतदान हो चुका है। शेष तीन चरणों में मतदान के लिए 172 सीटें ही बची हैं। इसके बावजूद तटस्थ चुनावी पंडित दावे के साथ कोई भी भविष्यवाणी करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। बेशक सत्ता के दोनों बड़े दावेदार यानी भाजपानीत गठबंधन और सपानीत गठबंधन मतदान के संपन्न ही नहीं, आने वाले चरणों में भी अपनी जीत के दावे दोहरा रहे हैं। पर इन दावों की विश्वसनीयता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अप्रत्याशित चुनाव परिणामों की बात कह कर अपनी सरकार बनने का विश्वास बसपा भी जता रही है, जिसे राजनीतिक प्रेक्षक सत्ता की दौड़ में ही शामिल नहीं मान रहे। जिस उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने न सिर्फ पिछले तीन विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत से अपनी सरकार चुनी हो, बल्कि भाजपा के पक्ष में प्रचंड मतदान से वर्ष 2014 और 19 में उसे लोकसभा में बहुमत प्रदान करते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ करने में भी निर्णायक भूमिका निभायी हो—आज वही प्रदेश जटिल चुनावी प्रश्न क्यों बन गया है?

आधे से अधिक चुनाव निपट जाने के बावजूद उत्तर प्रदेश का अनुत्तरित प्रश्न बने रहना इसलिए ज्यादा चौंकाता है, क्योंकि महाबली भाजपा के मुकाबले देश की तरह प्रदेश में भी, चुनाव से पहले तक तो, विपक्ष को बलहीन और बिखरा हुआ मान लिया गया था। भाजपा के आत्मविश्वास का अनुमान भी इसी से लगाया जा सकता है कि उसके नेता शुरू से ही 300 पार के नारे पर अटके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा में बहुमत के लिए मात्र 202 सीटें ही चाहिए। ऐसे उच्च आत्मविश्वास के बावजूद ऐसा क्यों है कि 57 प्रतिशत से ज्यादा सीटों पर मतदान के बाद भी खुद भाजपा के अलावा कोई उसके स्पष्ट बहुमत के प्रति आश्वस्त नहीं है। वैसे यह संतोष की बात है कि हाल के दशकों में देश के ज्यादातर राज्य, सरकार के लिए स्पष्ट जनादेश ही देते रहे हैं। उत्तर प्रदेश इस मामले में अधिक प्रशंसा का पात्र इसलिए माना जा सकता है कि दर्जन भर जाति आधारित छोटे दलों के अलावा दो बड़े क्षेत्रीय और दो बड़े राष्ट्रीय दलों के होते हुए भी उसके मतदाता पिछले तीन विधानसभा चुनावों से स्पष्ट जनादेश देते आये हैं। वर्ष 2002 में बनी त्रिशंकु विधानसभा के बाद राज्य में सत्ता-राजनीति का जैसा अवसरवादी खेल चला, शायद उससे मतदाताओं ने सबक सीखा होगा। वैसे दिलचस्प यह भी है कि वर्ष 2007 और 2012 में जनादेश विरोधाभासी ही रहे। मसलन 2007 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने 206 सीटों के स्पष्ट बहुमत के साथ बसपा को सत्ता सौंपी तो सपा को 97 सीटों पर समेट दिया, लेकिन 2012 के चुनाव में पासा उलट गया। मतदाताओं का मायावती से ऐसा मोहभंग हुआ कि बसपा को 80 सीटों पर समेटते हुए सपा को 224 सीटों के स्पष्ट बहुमत के साथ सिंहासन पर बिठा दिया।

ध्यान रहे कि जातीय वोट बैंक के साथ मुस्लिम मतों की रणनीतिक एकजुटता तथा राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की समानता के अलावा तो सपा-बसपा परस्पर विरोधी दल ही हैं। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के मतदाताओं द्वारा अदल-बदल कर उन पर विश्वास जताने से स्वाभाविक ही विकल्प की सीमाएं भी उजागर हो जाती हैं,क्योंकि 2012 के विधानसभा चुनाव तक तो राज्य में राष्ट्रीय दलों की हैसियत क्षेत्रीय दलों से भी गयी-गुजरी थी। आंकड़ों की बात करें तो 2007 के चुनाव में 350 सीटों पर लडऩे वाली भाजपा 20 प्रतिशत से भी कम मतों के साथ 51 सीटें ही जीत पायी थी तो 393 सीटों पर लडऩे वाली कांग्रेस के हिस्से 9 प्रतिशत से भी कम मतों के साथ मात्र 22 सीटें आयी थीं। इसी तरह 2012 के चुनाव में 398 सीटों पर लड़ कर भाजपा मात्र 15 प्रतिशत मत और 47 सीटें ही हासिल कर पायी, जबकि 355 सीटों पर लडऩे वाली कांग्रेस के हिस्से 12 प्रतिशत से कम मत और 28 सीटें आयीं। राम मंदिर समेत हिंदुत्व के मुद्दों की राजनीति करने के बावजूद इक्कीसवीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में लगातार सिकुड़ती भाजपा की किस्मत वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से ही बदली, जब नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार इस दक्षिणपंथी पार्टी ने तीन दशक लंबे अंतराल के बाद लोकसभा में अकेले दम स्पष्ट बहुमत हासिल करने का करिश्मा कर दिखाया। ध्यान रहे कि 1984 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका था, जब किसी एक दल को केंद्र में सरकार बनाने लायक स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ, वरना तो दर्जनों दलों के गठबंधन ही तीन दशक तक सत्तारूढ़ रहे।

केंद्र और राज्य में डबल इंजन यानी कि एक ही दल की सरकार को तीव्र विकास का फॉर्मूला बताये जाने के बावजूद अगर उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए भी जटिल चुनावी प्रश्न बना हुआ है, तो यह स्थिति गंभीर राजनीतिक विमर्श की मांग करती है। यह स्थिति का अत्यंत सरलीकरण ही होगा कि पांच साल के शासन के बाद सत्ता विरोधी भावना स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के तीन दशक से लंबे चले शासन को अतीत की बात मान लें तो भी वर्तमान में वहीं ममता बनर्जी और ओडिशा में नवीन पटनायक के उदाहरण हमारे सामने हैं। इन नेताओं को बार-बार सत्ता का जनादेश मिलना बताता है कि अगर आप जन आकांक्षाओं पर खरा उतरें तो मतदाता हर चुनाव में सरकार बदलना जरूरी नहीं समझते। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने पर भाजपा ने संभावित दावेदारों को दरकिनार कर सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया। इस अप्रत्याशित चयन की अपनी-अपनी तरह से राजनीतिक व्याख्या की जाती रही है। कानून व्यवस्था में सुधार की बात भाजपा विरोधी भी निजी बातचीत में स्वीकारते रहे, लेकिन योगी ने जिस तरह पुलिस को मनमानी की छूट दी, उससे अंतत: सवालिया निशान भी लगे। बिजली आपूर्ति में सुधार की बात भी किसी हद तक स्वीकार की जा सकती है, लेकिन क्या उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सरकार की भूमिका यहीं तक सीमित मानी जा सकती है?

उत्तर प्रदेश और बिहार को राजनीति जीवी प्रदेश कहा जाता है। इसलिए वहां के मुख्यमंत्रियों से अतिरिक्त राजनीतिक सक्रियता और जन संपर्क-संवाद की अपेक्षा की जाती है। योगी से सबसे बड़ी शिकायत यही रही कि उन्होंने जन संपर्क-संवाद नहीं रखा। मंत्रियों की भूमिका भी बेहद सीमित कर दी गयी और पूरा शासन पसंदीदा नौकरशाहों की 11 सदस्यीय टीम चलाती रही। जब आप अपने परंपरागत जनाधार से बहुत ज्यादा मत-सीट पाते हैं, तो जाहिर है कि आपको अनपेक्षित वर्गों से भी समर्थन मिला है, जिसमें सरकार बनने पर बहुत-सी अपेक्षाएं निहित होती हैं। इन अपेक्षाओं को राजनेता तो समझ सकते हैं, पर नौकरशाहों के लिए नामुमकिन है। अपनी परंपरागत दलीय संबद्धता त्याग कर 2014 से 19 तक भाजपा के पक्ष में मुखर मतदान करने वाले कई वर्ग इस चुनाव में किनारा करते नजर आ रहे हैं, तो यह अपेक्षाओं की अनदेखी का भी परिणाम है।

बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार देशव्यापी समस्याएं हैं। इसका अर्थ यह हरगिज नहीं कि इन्हें स्वीकार कर लिया जाये, लेकिन अपनी चुनौतियां बढ़ाने में खुद भाजपा का कम योगदान नहीं रहा। मेरा मानना है कि विवादास्पद तीन कृषि कानून प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल रहे। इसका अहसास करने में उन्हें साल भर लग गया। तब तक तो राजनीतिक नुकसान हो चुका था। भूल सुधार भी जिस अंदाज में किया गया, उससे नुकसान की भरपाई होने के बजाय अविश्वास की खाई और चौड़ी ही हुई। फिर इस यू टर्न से भाजपा को हासिल क्या हुआ? यह प्रश्न अनुत्तरित है। परिणाम सामने है : विकल्पहीनता को खारिज करते हुए दो युवाओं अखिलेश यादव और जयंत चौधरी ने ऐसा विकल्प पेश कर दिया कि भाजपा के लिए बहुमत का आंकड़ा भी अब आसान लक्ष्य नहीं रहा। जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता का प्रतिशत सबसे ज्यादा रहा था, इस बार वहीं सबसे ज्यादा नुकसान का अनुमान है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले दो चरणों में जिन 113 सीटों के लिए मतदान हुआ, उनमें से 91 पिछली बार भाजपा ने जीती थीं।

इस बार आधी भी मिल जायें तो राहत की बात होगी। यह नुकसान अपेक्षित था। फिर भी सात चरणों के मतदान की शुरुआत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से करायी गयी। नतीजतन दो चरणों से चली हवा और बना माहौल अगले चरणों में भी, कुछ कम सही, प्रभावी नजर आया। भाजपाई रणनीतिकार भी निजी बातचीत में स्वीकार रहे हैं कि ऐसी चुनौतियों की अपेक्षा नहीं थी। यह भी कि डगर बहुत मुश्किल है, पर उनकी उम्मीदें अब इस बात पर टिकी हैं कि पिछली बार भाजपानीत गठबंधन ने बहुमत के आंकड़े से 123 सीटें ज्यादा जीती थीं, इस बार उतनी सीटों का नुकसान भी हो जाये तो सरकार बनाने में समस्या नहीं आयेगी। खुद को अजेय समझने वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के लिए इस स्थिति की स्वीकारोक्ति पराजय की आहट तो नहीं है?

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