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सियाचिन सामरिक प्रासंगिकता की पुनर्समीक्षा जरूरी

मेजर जन. (अ.प्रा.) अशोक के. मेहता

जनरल एमएम नरवणे ने यह कह कर खलबली मचा दी ‘यदि एक बार पाकिस्तान वास्तविक सीमा रेखा की निशानदेही कर दे तो हम भी सियाचिन को गैर-सैन्य क्षेत्र बनाने के विरुद्ध नहीं हैं।’ उनके इस कथन ने सियाचिन की सामरिक प्रासंगिकता पर बहस को पुन: जिंदा कर दिया है। वर्ष 2019 में सेनाध्यक्ष बनते ही जनरल नरवणे ने कहा था कि सियाचिन ग्लेशियर पाकिस्तानी और चीनी सेनाओं के बीच फंसा हुआ है। भारत के सबसे ज्यादा अलंकृत सैनिक ले. जनरल जेसी बक्शी, जो कि हाजीपीर विजय के नायक भी हैं, उन्होंने कहा था, ‘सियाचिन से हमारी वापसी हो सकती है बशर्ते पाकिस्तान इतनी ऊंचाई पर अपनी ब्रिगेड तैनात न करे।’ इसी तरह अन्य सैन्य कमांडर ले. जनरल छिब्बर, जिनकी निगरानी में 1984 में सियाचिन पर भारत का कब्जा हुआ था, उन्होंने भी बाद में कहा था, ‘सियाचिन की सामरिक प्रासंगिकता कुछ खास नहीं है, जो कुछ कहा जा रहा है वह किसी की इजाद है।’ इसी तर्ज पर बांग्लादेश युद्ध के दौरान डायरेक्टर जनरल, मिलिट्री ऑपरेशंस रहे ले. जनरल इंदर गिल ने 1997 में कहा था, ‘दोनों मुल्क बिना विशेष सामरिक नफे के अपना-अपना पैसा सियाचिन पर बर्बाद कर रहे हैं।’

यही कुछ अन्य अधिकारी भी कहते आए हैं कि सियाचिन पर नियंत्रण बनाए रखने की महत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और यह डर दिखाना कि हमारी उपस्थिति हटने से चीन और पाकिस्तान की संयुक्त पहुंच लेह तक आसान हो जाएगी, कल्पना मात्र है। जबकि जानकारी के मुताबिक, ऐसा करना वह नायाब कार्य होगा जो कतई व्यवहार्य नहीं है। परंतु नई पीढ़ी के अफसरों का मानना है कि परिस्थिति बदल चुकी है– विपरीत दिशाओं में हमारे समक्ष आज दो मोर्चों वाली स्थिति है। उनके लिए, पुराने सीमा पहरूओं का कहना है कि पाकिस्तान के साथ हुए 1965 और 1971 के युद्धों के समय चीन ने सीमापार से केवल आंखें तरेरी थीं।

वर्ष 2016 में जब हिम-स्खलन अपने साथ हमारे 10 सैनिक बहा ले गया था, तब सियाचिन ने फिर से ध्यान खींचा था। उस वक्त भी सर क्रीक के इस इलाके से कोई खास फायदा नहीं था, लेकिन फिलहाल यह मसला कश्मीर समस्या पर बृहद वार्ता का एक अंग है। हिमस्खलन त्रासदी ने सियाचिन की अत्यंत दुरूह भौगोलिकता को पुन: उजागर किया था। वर्ष 2012 में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल परेवज़ कियानी ने हिमस्खलन में बही अपनी ग्यारी चौकी, जिसमें 120 जवान मारे गए थे, की घटना के बाद सियाचिन से सेना की द्विपक्षीय वापसी की तजवीज़ की थी। भारत की तरह, पाकिस्तान में भी नए युवा अधिकारी सियाचिन तैनाती पर अपनी मर्दानगी सिद्ध करने में उत्साह रखते हैं, जबकि वहां पहुंचकर सामना स्वास्थ्य के लिए विपरीत स्थितियों से होता है। ब्रुकिंग्स स्नातक स्टीफन कोहेन कहते हैं, ‘सियाचिन मसला कंघी के लिए लड़ रहे दो गंजे आदमियों जैसा है।’ सियाचिन तक पहुंचना ही बहुत दुरूह है और कब्जा बनाए रखने में भी विशेष लाभ नहीं है, इसका पता 1949 और 1972 में हुई नक्शाबंदी से चलता है, जब दोनों बार यह काम एनजे 9842 बिंदु तक जाकर रोकना पड़ा, इससे आगे सियाचिन ग्लेशियर का इलाका शुरू होता है।

जब से भारत ने 1984 में पूर्व-कार्रवाई द्वारा सियाचिन से पाकिस्तान को बेदखल करने की कोशिशें करनी शुरू कीं, तब से इसकी सामरिक महत्ता गिनाई जाने लगी। इसको अपने कब्जे में रखना इज्जत का सवाल हो गया, भले ही कीमत कुछ भी चुकानी पड़े। पहले साल्टोरो रिज की 21000 फुट ऊंचाई वाली कायद चौकी पाकिस्तान के कब्जे में थी। वहां से बैठकर वह समूचे सियाचिन क्षेत्र में गोलाबारी से कहर बरपाने की स्थिति में था। 24 जून, 1987 के दिन जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री की टुकड़ी ने विपरीत मौसम में, लगातार 48 घंटे चले अभियान में, जमे झरने की सीधी खड़ी बर्फीली दीवार से चढक़र कायद चौकी पर पैर जमाने में सफलता हासिल की। साल्टोरो रिज के इस तीखे शिखर पर, जहां संतरी सहित महज पांच आदमी लायक जगह है, उसे बाना सिंह और उनके दल ने हमला कर कब्जा लिया। सम्मानपूर्वक कायद चौकी का नया नाम ‘बाना पोस्ट’ रखा गया और इस तरह इस चौकी का उल्लेख जम्मू-कश्मीर में चले सैन्य अभियानों में सबसे प्रतिष्ठित एवं अलंकृत बन गया। बहादुरी के लिए बाना सिंह को परमवीर चक्र मिला तो साथियों में तीन को वीर चक्र और अन्य बहादुरी पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

कायद चौकी हारने का मातम पाकिस्तान भर में मना, तत्कालीन विपक्षी नेता बेनज़ीर भुट्टो ने जनरल जिया-उल-हक पर तंज कसते हुए कहा कि हमारी फौज को चूडिय़ां पहन लेनी चाहिए। पाकिस्तान ने उक्त बाना उर्फ कायद चौकी को फिर से कब्जाने के लिए अभियान चलाया, लेकिन 8 जेके राइफल्स से प्रभार लेने की प्रक्रिया में वहां पहुंची 1/4 गोरखा राइफल के जवानों ने यह हमला विफल कर दिया, इस लड़ाई में पुन: पोस्ट के खाते में एक महावीर चक्र और एक वीर चक्र का इजाफा हुआ।
पाकिस्तान सियाचिन में मिली हार को भूला नहीं है, न ही उसने शिमला समझौते के उल्लंघन के लिए भारत को माफ किया है। लंदन स्थित रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस में कोर्स के दौरान सहपाठी रहे ले. जनरल मोइउद्दीन हैदर (जो बाद में पाकिस्तान के गृह मंत्री बने) की कही बात याद करूं तो उन्होंने मुझे याद दिलाया था कि कैसे भारत ने बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी बनाकर और सियाचिन पर अवैध कब्जा करके धोखा किया है। इसका बदला जम्मू-कश्मीर में छद्म युद्ध के रूप में है। सियाचिन पर नियंत्रण की होड़ शुरू होने के बाद से दोनों पक्षों को इसकी कीमत 2150 सैनिकों की जान चुकाकर और 5000 घायलों के रूप में देनी पड़ी है, अनुमान है रोजाना 10 लाख डॉलर का खर्च भी वहन करना पड़ता है। आरंभिक दिनों में, ग्लेशियर पर हमारे फौजियों के लिए सुविधाएं एकदम साधारण थीं,  लेकिन धीरे-धीरे सुविधा और भत्तों में काफी सुधार होता गया। स्टेट ऑफ आर्ट हाई ऑल्टीट्यूड साजो-सामान, राशन और अच्छे मुआवज़े ने सियाचिन तैनाती के दौरान जानी और जिस्मानी नुकसान के फिक्र को गौण किया है। 2003 में लागू हुए और 2021 में पुन: सुदृढ़ किए गए युद्ध विराम के बाद से शत-प्रतिशत मौतें अब केवल मौसम की वजह से हैं।

सियाचिन का आधार कैम्प, जो ग्लेशियर के मुहाने पर है, अब मानो सैनिकों के लिए पर्यटक आकर्षण है। निचले ग्लेशियर या उसके आसपास के इलाके में किसी फौजी का तैनाती काल केवल 180 दिनों का रखा गया है, वहीं साल्टोरो की कुछ चौकियों पर यह अवधि कभी भी 90 दिनों से अधिक नहीं होती तो बाना पोस्ट पर सैनिक को महज 30 दिन रहना पड़ता है, जिस तक पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी और विश्व का सबसे ऊंचा हैलीपैड सोनम (19000 फुट) है। सियाचिन पर सुविधा-स्थिति तब से सुधरना शुरू हुई जब तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने मंत्रालय के सिविल अधिकारियों को वहां की ठंड और परेशानियों का वास्तविक अनुभव लेने को भेजा था। हर क्रिसमस पर जार्ज साहिब खुद मैंगलोर के सुप्रसिद्ध केक लेकर पहुंचा करते थे। 7वें वेतन आयोग ने भी अपना काम किया। पहले जिस सिपाही का मासिक तैनाती भत्ता मात्र 100 रुपये था, अब उसका मासिक जोखिम भत्ता 14000 रुपये से बढ़ाकर 19000 कर दिया गया है, अफसरों के लिए यह बढ़ोतरी 21000 रुपये से 35000 रुपये की है। हालांकि, लेह में नियुक्त सिविल स्टाफ का भत्ता 5500 रुपये से 75000 रुपये के बीच है। पाकिस्तान के साथ बृहद वार्ता प्रक्रिया में रक्षा सचिवों की कार्य-सूची में सियाचिन मुद्दा 6वें स्थान पर है।

संवाद के 13 चरण हो चुके हैं, आखिरी 2012 में रावलपिंडी में हुआ था, इससे पहले 1989, 1992 और 2006 में भी सहमति बनते-बनते रह गई थी। जनरल नरवणे ने अपने नए कथन से सियाचिन मुद्दे के हल और द्विपक्षीय रिश्तों में सुधार के लिए एक और दरवाजा खोलने की कोशिश की है।
लेखक सैन्य मामलों के टिप्पणीकार हैं।

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