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फ्रांस में सियासी उलटफेर

फ्रांस के संसदीय नतीजों से साफ है कि देश में दशकों से जारी मध्यमार्गी सहमति अब टूट गई है। अब यह स्पष्ट है कि आगे शासन करना राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।

उचित ही विश्लेषकों ने इसे फ्रांस में में सियासी भूचाल कहा है। संसदीय चुनाव के नतीजों का असल मतलब यही है। इस चुनाव में असली विजेता धुर वाम और धुर दक्षिणपंथी पार्टियां रहीं। इन नतीजों ने देश में दशकों से जारी मध्यमार्गी सहमति को एक तरह से भंग कर दिया है। चुनाव नतीजों का संकेत है कि जनता के स्तर पर एक प्रभावशाली मैक्रों विरोधी मोर्चा बन गया। अब यह स्पष्ट है कि आगे शासन करना राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। बीते ढाई दशक में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब राष्ट्रपति की पार्टी का संसद में बहुमत ना रहा हो। अगर अब ये सूरत सामने है, जिसमें राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पार्टी- एसेंबल स्पष्ट बहुत के आंकड़े से 44 सीटें दूर रह गई। वैसे सबसे चौंकाने वाला प्रदर्शन धुर दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी का रहा। पहले चरण के मतदान के बाद लगाए गए अनुमानों में मेरी लेन पेन के नेतृत्व वाली इस पार्टी को 30 से 35 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की गई थी। लेकिन असल में उसे 89 तक सीटें मिली हैं। मैक्रों की मध्यमार्गी पार्टी 577 सदस्यों वाली संसद में 245 सीटों पर सिमट गई। धुर वामपंथी नेता ज्यां ल्युक मेलेन्शॉं के नेतृत्व मे बने वामपंथी गठबंधन- न्यू पॉपुलर यूनियन ने 131 सीटों हासिल कीं।

इसके अलावा अन्य वामपंथी दलों को 22 सीटें मिली हैं। यानी सभी वामपंथी दल मिल कर 153 सीटें जीतने में सफल रहे। अब मैक्रों की सारी उम्मीदें परंपरागत कंजरवेटिव पार्टी लेस रिपब्लिकन्स पर टिकी हुई हैँ। इस पार्टी को भी अपेक्षा से अधिक सफलता मिली। वह 61 सीटें जीतने में सफल रही। इसे मैक्रों के विचारों के करीब समझा जाता है। लेकिन उसके नेताओं ने कहा है कि मैक्रों उनके समर्थन को सुनिश्चित मान कर नहीं चल सकते। साफ है, मैक्रों को समर्थन देने के बदले ये पार्टी कड़ी सौदेबाजी करेगी। समर्थन हासिल करने के लिए राष्ट्रपति को हर मौके पर उसके आगे चिरौरी करनी होगी। तो अचानक राजनीति में जिस तरह मैक्रों चमके थे, अब वो चमक जाती रहेगी। अंदेशा यह है कि अगले पूरे पांच साल वे एक लेम डक राष्ट्रपति नजर आ सकते हैं।

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