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महंगाई का राजनीति महत्व समाप्त!

अजीत द्विवेदी
जिस तरह हर वस्तु और विचार की एक्सपायरी डेट होती है उसी तरह राजनीतिक मुद्दों के साथ भी होता है। एक समय आता है, जब राजनीतिक मुद्दे, नारे आदि एक्सपायर हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि उन मुद्दों का आम आदमी के जीवन में महत्व खत्म हो जाता है। उनका महत्व रहता है और यह भी संभव है कि महत्व ज्यादा हो जाए, फिर भी उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। जैसे अभी महंगाई की हो गई है। एक जमाने में महंगाई का मुद्दा सबसे बड़ा होता था। 1977 में बनी देश की पहली गैर कांग्रेस सरकार भले नेताओं के आपसी कलह से गिरी थी, लेकिन उस सरकार के चुनाव हारने में सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई का था। दिल्ली में 1998 में प्याज का 60 रुपए किलो बिकना सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा था और इस मुद्दे पर भाजपा चुनाव हारी थी। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर 2014 में चुनाव लडऩे उतरे तो उनके प्रचार अभियान में भी महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा था। उन्होंने नारा दिया था, ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’। एक दूसरा नारा था ‘बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार’।

कई और कारणों से कांग्रेस की सरकार से नाराज लोगों ने महंगाई और विकास के मुद्दे पर भाजपा को वोट दिया और 30 साल बाद पहली बार केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। उसके बाद लोकसभा का एक और चुनाव हुआ और विधानसभा के 50 के करीब चुनाव हुए कहीं भी महंगाई का मुद्दा सुनने को नहीं मिला। सुनने को तो विकास का मुद्दा भी कहीं नहीं मिला पर उसे छोड़ सकते हैं क्योंकि विकास एक सब्जेक्टिव विषय है। उसके बारे में सबकी अपनी अपनी धारणा हो सकती है। लेकिन महंगाई तो सार्वभौमिक है। सबके लिए समान रूप से है। फिर भी इसकी चर्चा नहीं है। सोचें, आठ साल पहले कैसे भाजपा के नेता प्याज और सब्जियों की माला पहन कर और सिलेंडर लेकर धरने पर बैठा करते थे। तब रसोई गैस के एक सिलेंडर की कीमत चार सौ रुपए थी, अब उसकी कीमत एक हजार रुपए है लेकिन जब विपक्ष के नेता सिलेंडर लेकर धरना देने निकलते हैं तो लोग ही उनका मजाक उड़ाने लगते हैं। महंगाई आम लोगों की समस्या है, लेकिन उनको लगता है कि विपक्ष अपने राजनीतिक लाभ के लिए यह मुद्दा उठा रहा है। ऐसा लगता है कि जनता ने सोच लिया है कि विपक्ष को किसी तरह से राजनीतिक लाभ नहीं लेने देना है, चाहे उन्हें खुद कितनी भी समस्या क्यों न झेलनी पड़े।

महंगाई को न्यायसंगत ठहराने के कारण भी खोज लिए गए हैं। पहले अगर कोई नेता महंगाई को सही ठहराता था तो उसे असंवेदनशील माना जाता था। आम लोगों में उसकी छवि जन विरोधी नेता की बनती थी। जब महंगाई के मुद्दे की एक्सपायरी डेट नहीं आई थी तब यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि कोई नेता महंगाई के लिए अपने से पहले वाली या उससे भी पहले वाली सरकार को जिम्मेदार ठहराएगा। अगर कोई ठहराता भी था तो जनता उसे तुरंत खारिज कर देती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। अब सत्तापक्ष खुलेआम कहता है कि देश के पहले प्रधानमंत्री महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं या देश की पहली सरकार के समय भी महंगाई थी। कई बार तो संसद में बताया जाता है कि जब देश के पहले प्रधानमंत्री के समय महंगाई थी तो उन्होंने क्या कहा था। नेता और मंत्री सवाल उठाने वालों से सार्वजनिक रूप से पूछते हैं कि मुफ्त में वैक्सीन लग रही है, मुफ्त में अनाज बंट रहा है, किसानों को सम्मान निधि दी जा रही है इसके लिए पैसे कहां से आएंगे? दिलचस्प यह है कि लोग महंगाई पर सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा रहे हैं और महंगाई को न्यायसंगत ठहराने वालों का समर्थन कर रहे हैं।

इससे लग रहा है कि यह राजनीतिक मुद्दों के विपर्यय का समय चल रहा है। लोग उन मुद्दों को भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं, जो सीधे उनके जीवन से जुड़े हैं। ऐसा तभी होता है, जब उन्हें लगने लगे कि महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि से ज्यादा बड़े मुद्दों पर सरकार काम कर रही है। भारत में अभी ऐसा ही समय चल रहा है। आम लोगों ने अपनी समस्याओं को राजनीति से अलग और स्थगित कर दिया है। वे मान रहे हैं कि इस समय भारत को विश्वगुरू बनाने का अभियान चल रहा है। हिंदुओं को ऐतिहासिक सम्मान दिलाने और उनको ताकतवर बनाने का अभियान चल रहा है। दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाई जा रही है। देश के दुश्मनों को सबक सिखाया जा रहा है। सोचें, जब इतने बड़े काम हो रहे हों तो उसमें क्या लोग छोटी सी कुर्बानी नहीं दे सकते हैं? सो, महंगा पेट्रोल-डीजल-सीएनजी-पीएनजी-रसोई गैस और खाने-पीने की चीजें खरीद कर लोग देश के पुनर्निर्माण और हिंदू पुनरूत्थान में योगदान दे रहे हैं।

अगर सोशल मीडिया में चल रहे लोकप्रिय विमर्श को देखें तो महंगाई को लेकर कुछ बहुत कॉमन विचार दिखाए देंगे। जैसे यह सही है कि महंगाई बढ़ी है लेकिन क्या सरकार आपराधिक तत्वों के ऊपर बुलडोजर नहीं चला रही है? महंगाई बढ़ी है लेकिन क्या हिंदुओं को मस्जिदों के ऊपर चढ़ कर भगवा लहराने की आजादी नहीं मिली है? महंगाई बढ़ी है लेकिन क्या अनुच्छेद 370 नहीं हटा है, राम मंदिर नहीं बन रहा है, तीन तलाक का कानून नहीं बना है, सीएए नहीं आया है, हिजाब पर पाबंदी नहीं लगी है? महंगाई बढ़ी है लेकिन क्या जेएनयू में नवरात्रि पर पूजा और हवन नहीं हो रहा है? क्या पहले कभी देश में ऐसा सोचा जा सकता था? असल में अंग्रेजों के जमाने से ही देश के हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद एक किस्म की कुंठा और हीनता बोध का शिकार रहे हैं, जिसे मैजोरिटेरियन इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स कहा जाता है। अब जाकर उनको इस कुंठा और हीनता बोध से मुक्ति मिली है। उनको लग रहा है कि अब असल में उनका समय आया है। हिंदू गौरव का समय अब आया है।

एक तरफ लोगों की मानसिकता में यह बदलाव आया है तो दूसरी ओर रोजमर्रा के जीवन की बुनियादी जरूरतों को सरकार पूरा करने लगी है। पांच किलो अनाज और एक किलो दाल हर व्यक्ति को पिछले दो साल से मिल रहा है। चुनाव के समय तेल और नमक भी मिल जाता है। सरकार घर बनवा कर दे रही है या घर और शौचालय बनाने के नकद पैसे मिल रहे हैं। करीब 11 करोड़ लोगों के खाते में किसान सम्मान निधि के नाम पर पांच सौ रुपए हर महीने डाले जा रहे हैं। महिलाओं के खाते में नकद पैसे डाले जा रहे हैं। दो-तीन सौ रुपए सालाना के प्रीमियम पर दुर्घटना और जीवन बीमा किया जा रहा है। इलाज की आयुष्मान भारत योजना चल रही है। ऊपर से केंद्र सरकार की योजनाएं से इतर हर राज्य सरकार भी इस तरह की योजनाएं चला रही हैं। इसलिए एक बड़ी आबादी को जीवन की बुनियादी जरूरतों के मामले में प्रत्यक्ष रूप से महंगाई की मार नहीं झेलनी पड़ रही है। यह बहुत बड़ा वर्ग है, जिसे राजनीतिक शब्दावली में लाभार्थी कहा जा रहा है। यह सही है कि इस तरह के जीवन में सम्मान नहीं है, लेकिन सवाल है कि सम्मान का लेकर भी क्या करेंगे, अचार डालेंगे? सो, महंगाई है तो है लेकिन सरकार उससे ज्यादा बड़े मुद्दों पर काम कर रही है इसलिए महंगाई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। इस मुद्दे पर चुनावी हार-जीत नहीं हो सकती है। अगर कोई तृणमूल कांग्रेस या आम आदमी पार्टी की जीत में महंगाई का कारण खोज रहा है तो वह मूर्खों के स्वर्ग में रह रहा है।

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