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दो-राहे पर खड़ा नेपाल

मौजूदा शेर बहादुर देउबा सरकार ने इस धारणा को तोडऩे की कोशिश है। बल्कि अब राय यह बनी है कि नेपाल का झुकाव अमेरिका की तरफ हो गया है। जाहिर है, उससे चीन चिंतित है।

नेपाल की पूर्व कम्युनिस्ट सरकारों का झुकाव चीन की तरफ था। तब ये धारणा बनी थी कि नेपाल चीन के खेमे में शामिल हो गया है। मौजूदा शेर बहादुर देउबा सरकार ने इस धारणा को तोडऩे की कोशिश है। बल्कि अब राय यह बनी है कि नेपाल का झुकाव अमेरिका की तरफ हो गया है। जाहिर है, उससे चीन चिंतित है। तो बीते हफ्ते खबर आई कि चीन ने नेपाल को सरकार साफ संदेश दिया है कि ‘दूसरे आंतरिक या बहरी पहलुओं’ के कारण उसकी वन चाइना नीति प्रभावित नहीं होनी चाहिए। गौरतलब है कि हाल में कई अमेरिकी अधिकारियों की नेपाल यात्रा की। खास ध्यान पिछले दिनों अमेरिका की मानव अधिकार उप मंत्री उजऱा ज़ेया की नेपाल यात्रा ने खींचा।

उस दौरान जेया ने नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों से भी मुलाकात की। इससे चीन में व्यग्रता पैदा होना लाजिमी है। तो अब उसने नेपाल को वन चाइना नीति की याद दिलाई है। इसका मतलब यह है कि नेपाल तिब्बत या ताइवान को चीन के अभिन्न अंग के रूप में देखता। चीन ने यह संदेश नेपाल-चीन द्विपक्षीय परामर्श समूह की 14वीं बैठक के दौरान दिया। नेपाली मीडिया के मुताबिक चीनी पक्ष ने उजऱा ज़ेया की नेपाल में हुई मुलाकातों का सीधे जिक्र नहीं किया। लेकिन जो संदेश दिया, उसका मतलब स्पष्ट है।

तो नेपाल आज एक दोराहे पर खड़ा है। यह स्थिति देश में मौजूद मतभेदों के कारण भी है। उजऱा ज़ेया की गतिविधियों पर चीन की प्रतिक्रिया तो बाद में आई है। उसके पहले पूर्व प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के प्रमुख केपी शर्मा ओली इस पर एतराज जता चुके थे। उन्होंने आरोप लगाया है कि ज़ेया ने तिब्बती शरणार्थियों को उकसाने की कोशिश की। इस रूप में ज़ेया ने नेपाल की विदेश नीति के उसूलों और नियमों का उल्लंघन किया। ओली आज भी देश के एक ताकतवर नेता हैँ। मुमकिन है कि इस साल होने वाले आम चुनाव के बाद नेपाल की सत्ता में उनकी फिर प्रमुख भूमिका बन जाए। उनके बयान के निहितार्थ साफ हैं। इसीलिए फिलहाल इस बारे में कुछ कहना कठिन है कि नेपाल दोराहे से आगे किस दिशा में कब तक आगे बढ़ेगा।

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