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भारत की ये सच्चाई

संभव है कि सच इससे भी कहीं ज्यादा संगीन हो। फिर ये उस राज्य की कहानी है, जिसे भारत में अपेक्षाकृत समृद्ध माना जाता है। अगर वहां यह सूरत है, तो फिर पिछड़े और गरीब राज्यों में क्या हालत होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। मगर ये साफ है कि हमारे समाज की असल सच्चाई यही है।

महाराष्ट्र सरकार ने माना है कि राज्य में पिछले तीन सालों में कुपोषण से 6,852 बच्चों की मौत हो गई। जाहिर है, ये सरकारी आंकड़े हैं। यानी संभव है कि सच इससे भी कहीं ज्यादा संगीन हो। फिर ये उस राज्य की कहानी है, जिसे भारत में अपेक्षाकृत समृद्ध माना जाता है। अगर वहां यह सूरत है, तो फिर पिछड़े और गरीब राज्यों में क्या हालत होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। भारत के विश्व गुरु या महाशक्ति बनने की कहानी इन दिनों बहुत लोकप्रिय है। मगर समाज की असल सच्चाई यह है। अगर बच्चों को पूरा पोषण नहीं मिलता हो, तो फिर समाज कितना समृद्ध और विकसित है, वह अपने-आप जाहिर हो जाता है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर एक समिति बनाई थी। उसकी रिपोर्ट में ये आंकड़े सामने आए हैं। अदालत ने मार्च में जिला कलेक्टरों और जिला मजिस्ट्रेटों को सर्वे कर राज्य में ऐसे इलाकों को चिह्नित करने का आदेश दिया था, जहां आज भी बाल विवाह कराए जाते हैं। 2019 से लेकर 2022 तक राज्य के 16 आदिवासी जिलों में सर्वे कर इन आंकड़ों को इक_ा किया गया। सर्वे आंगनवाड़ी सेविकाओं और आशा सेविकाओं ने किए। रिपोर्ट में जो हकीकत सामने आई है वो दिखाती है कि बाल विवाह और कुपोषण जैसी समस्याएं आज भी भारत में विकराल रूप में मौजूद हैं।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि राज्य में बाल विवाह और कुपोषण के आंकड़ों का पता लगाने के लिए पहले कुपोषित बच्चों की जानकारी इक_ा की गई और फिर उनके माता पिता का पता लगाया गया। उद्देश्य यह पता लगाना था कि कितनी माएं नाबालिग यानी 18 साल से कम उम्र की थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले तीन सालों में कुल 1,33,863 आदिवासी परिवारों में 15,253 बाल विवाह हुए हैं। सर्वे में 1.36 लाख से भी ज्यादा बच्चे कुपोषित पाए गए, जिनमें से 14,000 से भी ज्यादा बच्चों की माताएं नाबालिग थीं। इन 1.36 लाख बच्चों में से कुल 26,059 बच्चे कुपोषण से बुरी तरह से प्रभावित पाए गए, जिनमें से 3,000 की माताएं नाबालिग थीं। अदालत ने इतनी बड़ी संख्या में हो रहे बाल विवाह के मामलों पर गहरी चिंता जताई और उचित ही इन आंकड़ों को ‘दिमाग चकरा देने वाला’ बताया। लेकिन सवाल यह है कि इन आंकड़ों से सरकारें कितनी संवेदनशील होंगी? आखिर समाज को नेतृत्व देने की जिम्मेदारी उन पर ही है।

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