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कोरोना से सचमुच कितने लोग मरे!

अजीत द्विवेदी
यह यक्ष प्रश्न बन गया है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से भारत में कितने लोगों की मौत हुई? बुधवार 20 अप्रैल की सुबह तक भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक पांच लाख 22 हजार छह लोगों की मौत कोरोना वायरस के संक्रमण से हुई है। मरने वालों की संख्या के लिहाज से अमेरिका और ब्राजील के बाद भारत दूसरे स्थान पर है और दुनिया भर में हुई 62 लाख 28 हजार से ज्यादा मौतों में भारत का हिस्सा 12 फीसदी है। लेकिन क्या सचमुच भारत में दो साल की महामारी में इतने ही लोग मरे? यह सवाल इसलिए है क्योंकि दुनिया इस आंकड़े को नहीं मान रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर दुनिया की तमाम वैज्ञानिक संस्थाएं, जर्नल्स, अखबार, पत्रिकाएं, गैर सरकारी संस्थाएं इस आंकड़े को स्वीकार नहीं कर रही हैं। उनका आकलन है कि भारत में जो संख्या बताई जा रही है उससे आठ गुना ज्यादा यानी करीब 40 लाख मौतें हुई हैं।

अब सवाल है कि दुनिया कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंची और सचाई कैसे सामने आएगी? इसके लिए सबसे पहले मौतों का आकलन करने के वैश्विक मॉडल और भारत सरकार के मॉडल के फर्क को समझना होगा। ध्यान रहे भारत सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लुएचओ और दूसरी विश्व संस्थाओं के मॉडल में कमी निकाली है। लेकिन वह एक सरकारी नजरिया है, जिस पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार करने की जरूरत है। डब्लुएचओ या दूसरी वैश्विक संस्थाओं का मॉडल बहुत सरल है। उन्होंने हर साल होने वाली मौतों का औसत आंकड़ा लिया और कोरोना महामारी की अवधि में हुई मौतों की संख्या के आंकड़े को उसके बरक्स रखा। मौत के सालाना औसत आंकड़े से ज्यादा जितनी भी मौतें कोरोना काल में हुई हैं, उनको कोरोना से हुई मौत माना गया। इसके उलट सरकार सिर्फ उन्हीं मौतों को कोरोना से हुई मौत मान रही है, जिनमें मौत का कारण कोविड-19 का संक्रमण दर्ज किया गया है।

भारत सरकार कह रही है कि डब्लुएचओ का मॉडल गड़बड़ है लेकिन असल में सरकार के मॉडल में कमी है। सरकार मृत्यु प्रमाणपत्र में दर्ज कारण के आधार पर गिनती कर रही है। लेकिन सबको पता है कि भारत में शहरी इलाकों में ही मृत्यु का पंजीयन होता है या मृत्यु प्रमाणपत्र बनाया जाता है। छोटे शहरों और कस्बों में भी ऐसा नहीं होता है। ऊपर से कोरोना महामारी में जितने लोग अस्पताल में इलाज के लिए गए उससे कई गुना ज्यादा लोग अस्पताल नहीं जा सके और घरों में दम तोड़ दिया। गांवों में इस तरह की अनगिनत मौतें हुईं। गंगा किनारे शव दफनाए जाने या गंगा नदी में शव बहाए जाने की तस्वीरें और वीडियो सारी दुनिया ने देखे। क्या ये सारी मौतें सरकार के खाते में दर्ज हुई हैं? देसी और विदेशी दोनों मीडिया ने श्मशानों के बाहर शवों की कतार दिखाई और चिता जलाए जाने के लिए 24 घंटे या उससे भी ज्यादा के इंतजार की खबरें दीं। गैर सरकारी संस्थाओं ने हजारों शवों के अंतिम संस्कार कराए। शहरों के श्मशानों में जगह कम पड़ गई तो शहर से दूर छोटे कस्बों में जाकर लोगों को अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करना पड़ा। इस तरह की घटनाओं और इनकी मीडिया कवरेज का इशारा भी इस तरफ है कि असली संख्या वह नहीं है, जो सरकार बता रही है।

सरकार मान रही है कि किसी व्यक्ति को कोरोना का संक्रमण हुआ और जिस दिन संक्रमण का पता चला उसके बाद एक निश्चित अवधि के भीतर उसकी मौत हो गई, वहीं असल में कोरोना से मरा है। क्या इससे वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है? अनेक लोगों की मौत कोरोना का संक्रमण ठीक होने के कई महीने बाद हुई। लांग कोविड की वजह से अभी तक लोग मर रहे हैं। अनेक लोगों में कोरोना संक्रमित होने के लक्षण नहीं दिखे और मौत हो गई। अनेक लोग इलाज के लिए अस्पताल नहीं जा सके और उनकी मृत्यु हो गई। अनेक लोग दूसरी बीमारियों से ग्रसित थे, जिन्हें कोरोना महामारी की वजह से अस्पतालों में जगह नहीं मिली, इलाज नहीं मिल सका और वे मर गए। क्या ऐसी सारी मौतें कोरोना के खाते में नहीं लिखी जानी चाहिए?

ध्यान रहे किसी एक संस्था ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला है कि भारत में 30 या 40 लाख या उससे भी ज्यादा मौतें हुई हैं। अलग अलग संस्थाओं ने अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल करके अपने अपने निष्कर्ष निकाले हैं और हैरानी की बात है हर निष्कर्ष यहीं बताता है कि भारत में जितनी मौतें बताई जा रही हैं, असल में उससे छह से आठ गुना ज्यादा मौतें हुई हैं। सबसे पहले दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साइंस’ ने जनवरी में बताया कि भारत में कोरोना की वजह से 30 लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं। इसके बाद दूसरी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘लैंसेट’ ने बताया कि भारत में 40 लाख या उससे ज्यादा मौतें हुई हैं। इसके मुताबिक दुनिया भर में जो ‘एक्सेस डेथ’ हुई है यानी हर साल होने वाली औसत मौतों से ज्यादा जो मौतें हुई हैं उनमें से एक चौथाई मौत सिर्फ भारत में हुई है। इसके मुताबिक अमेरिका, ब्राजील, मेक्सिको और रूस में जितनी ‘एक्सेस डेथ’ हुई है, उससे ज्यादा अकेले भारत में हुई है। भारत के आंकड़ों को लेकर यह भी निष्कर्ष है कि भारत ने वास्तविक संख्या से आठ गुना कम संख्या बताई है, जबकि वैश्विक औसत तीन गुने का है। यानी दुनिया में जितनी संख्या बताई गई है, उससे तीन गुना ज्यादा मौत हुई है, जबकि भारत के आंकड़ों से आठ गुना ज्यादा मौतें भारत में हुई हैं। तीसरी रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन की है, जिसका प्रकाशन अभी नहीं हुआ है और जिस पर भारत ने सवाल उठाया है। डब्लुएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कोरोना वायरस की महामारी की वजह से 40 लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं।

भारत में इन दिनों यह चलन हो गया है कि विश्व संस्थाओं का जो आंकड़ा अपने अनुकूल नहीं होता है उसे खारिज कर दिया जाता है और जिसमें सरकार की तारीफ होती है उसकी वाह-वाही की जाती है। इसी चलन के मुताबिक ‘साइंस’, ‘लैंसेट’ और डब्लुएचओ के आंकड़ों पर सवाल उठाया जा रहा है। सवाल है कि क्या सारी दुनिया की बौद्धिक जमात और विश्व संस्थाएं मिल कर भारत के खिलाफ साजिश कर रही हैं, जो उसके आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर बता रही हैं? एक तरफ सरकार के लोग बताते हैं कि दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है और अब भारत की बात गंभीरता से सुनी जाती है और दूसरी ओर कह रहे हैं कि सारी दुनिया भारत के खिलाफ साजिश कर रही है? दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकती हैं। असल में यह कोई साजिश नहीं है, बल्कि यह हकीकत है, जो भारत में भी कुछ अखबारों, पत्रिकाओं, गैर सरकारी संस्थाओं आदि के आकलन से जाहिर हो चुकी है। इसलिए भारत को सचाई स्वीकार करके ज्यादा से ज्यादा पीडि़त परिवारों को राहत मुहैया करानी चाहिए और ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध न हो।

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