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भाषा को लेकर चल रहा झगड़ा

हरिशंकर व्यास
अगर पूछा जाए कि भारत और दुनिया में भी क्षेत्र विशेष के लोगों को जोडऩे वाली सबसे मजबूत चीज कौन सी है तो उसका जवाब होगा- भाषा। जाति, धर्म से ऊपर भाषायी अस्मिता सबसे मजबूत होती है और सबसे नाजुक यानी संवेदनशील भी होती है। भारत के संदर्भ में इसे सिर्फ एक मिसाल से समझा जा सकता है। केंद्र सरकार ने 2019 के आखिर में नागरिकता कानून में संशोधन किया और धर्म के आधार पर नागरिकता के नए प्रावधान किए। लेकिन असम में यह कानून भाषा से जुड़ गया और इसका भाषायी आधार पर विवाद शुरू हो गया। असम के लोगों ने इस आधार पर विरोध किया कि अगर बांग्लादेश से आने वाले बांग्लाभाषियों को नागरिकता मिलेगी को असम की भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ेगी। यह विवाद इतना बढ़ा कि भाजपा को 2021 के मध्य में होने वाले चुनाव में नुकसान की आशंका सताने लगी और उसने नागरिकता कानून को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

भारत में पहले भी भाषा का मुद्दा बहुत विवाद का रहा है और देश में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ है। बांबे प्रांत से गुजराती और मराठी भाषा के आधार पर दो राज्य बने। उसी समय मराठी बोलने वालों का कुछ हिस्सा कर्नाटक में चला गया था, जिसे लेकर आज तक विवाद होता है। इसी तरह तमिलनाडु, कर्नाटक आदि राज्य भी भाषा के आधार पर बने। इसलिए आज अगर भाषा को लेकर कोई विवाद होता है तो उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे गंभीरता से लेना चाहिए। इसका कारण यह है कि भाषा का विवाद दूसरे विवादों को भडक़ाने का कारण बन सकता है और देश की एकता व अखंडता के सामने बड़ी चुनौती पैदा हो सकती है। ध्यान रहे यह देश एक बार धर्म के आधार पर बंट चुका है। इसलिए विभाजन बढ़ाने वाले किसी भी मुद्दे को जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी सुलझाना चाहिए।

राजनीतिक या निजी आर्थिक लाभ के लिए भाषा का विवाद शुरू करना बहुत खतरनाक हो सकता है। पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हिंदी को देश में संपर्क भाषा बनाने की बात कही थी। वह एक सामान्य बात थी, जिस पर किसी को भडक़ाऊ बयान देने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने किसी क्षेत्रीय भाषा को हटा कर हिंदी लागू करने की बात नहीं कही थी। उन्होंने अंग्रेजी को हटा कर हिंदी लाने की बात कही थी। अभी संपर्क भाषा के तौर पर अंग्रेजी का प्रयोग होता है, जिसे बोलने वाले देश में दो फीसदी लोग भी नहीं हैं। अगर संपर्क भाषा के तौर पर अंग्रेजी की जगह हिंदी का इस्तेमाल हो तो वह बेहतर होगा। आखिर देश के हर हिस्से में हिंदी बोली और समझी जाती है। लेकिन गृह मंत्री के बयान पर कई राज्यों ने ऐसी प्रतिक्रिया दी, जैसे उनकी अस्मिता पर बड़ा हमला हो गया हो। यह उनकी अस्मिता पर हमला नहीं था लेकिन उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए इसका इस्तेमाल किया। इसे रोका जाना चाहिए। ध्यान रहे केंद्र  सरकार की कई नीतियों से राज्यों की गैर भाजपा सरकारें नाराज हैं और अलग अलग तरह से नाराजगी जाहिर भी करती हैं। अगर संघ-राज्य के विवाद में भाषा एक मुद्दा बना तो बात बिगड़ सकती है।

दूसरे, अभिनेता-अभिनेत्रियों को भी इतने संवेदनशील मुद्दे पर बयान देकर विवाद नहीं खड़ा करना चाहिए। एक फिल्म अभिनेता अजय देवगन ने हिंदी को लेकर बयान दिया और बेवजह एक कन्नड़ अभिनेता से पंगा कर लिया। उन्होंने कहा कि अगर हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं है तो दक्षिण भारत वाले क्यों अपनी फिल्मों को हिंदी में डब करा कर रिलीज करते हैं। यह बहुत बेहूदा बयान था। लेकिन उस अभिनेता ने सिर्फ विवाद खड़ा करने के लिए यह बयान दिया था क्योंकि उसकी फिल्म रिलीज होने वाली है। विवाद के जरिए फिल्म का प्रमोशन करने के मकसद से इतने संवेदनशील विषय पर बोलना और उत्तर-दक्षिण का डिवाइड बनाना बहुत खतरनाक खेल है। जिस अभिनेत्री ने हिंदी को लेकर बयान दिया उसकी भी फिल्म रिलीज होने वाली है। अगर इसी तरह निजी आर्थिक लाभ के लिए फिल्म अभिनेता-अभिनेत्री भाषा का विवाद खड़ा करेंगे तो बड़ा नुकसान हो सकता है।

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