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सामने है खाद्य संकट

कोरोना महामारी के बाद जब जिंदगी सामान्य होने लगी, तो सप्लाई चेन भंग होने के परिणाम पर दुनिया का ध्यान गया। अभी इस समस्या से निपटने पर चर्चा ही हो रही थी कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। अब सूरत यह है कि दुनिया को आने वाले दिनों में गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है।

दुनिया में महंगाई पहले से बढ़ रही थी। कोरोना महामारी के कारण दो साल तक सब कुछ बाधित रहा। इसलिए जब जिंदगी सामान्य होने लगी, तो सप्लाई चेन भंग होने के परिणाम पर दुनिया का ध्यान गया। अभी इस समस्या से निपटने पर चर्चा ही हो रही थी कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। अब सूरत यह है कि दुनिया को आने वाले दिनों में गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है। उसका असर करोड़ों लोगों पर पड़ेगा। यूक्रेन संकट का सबसे जाहिर असर प्राकृतिक गैस की रिकॉर्ड महंगाई है। उसकी वजह से खाद उत्पादक कंपनियों अमोनिया और यूरिया के उत्पादन में कटौती करने का फैसला किया है। स्पष्टत: इसका असर खेती-बाड़ी पर पड़ेगा।

बीते दो हफ्तों की अवधि में कृषि उत्पादों के दाम में तेज उछाल आ चुका है। सबसे ज्यादा दाम गेहूं के बढ़े हैं। रूस और यूक्रेन दोनों गेहूं के सबसे निर्यातकों में शामिल हैँ। पूरी दुनिया में होने वाले गेहूं निर्यात में इन दोनों देशों का हिस्सा 30 फीसदी है। उर्वरकों के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। रूस फर्टिलाइजर का एक बड़ा निर्यातक है। युद्ध शुरू होने के बाद वहां से निर्यात लगभग ठहर चुका है। इसके परिणामस्वरूप दुनिया के कई क्षेत्रों में मक्के, सोयाबीन्स, और वनस्पती तेलों के दाम में भी उछाल देखा जा रहा है। चूंकि संकट सामने हैं, तो विभिन्न देश अपनी जनता को बचाने को प्राथमिकता दे रहे हैँ।

मसलन, मिस्र ने गेहूं, आटा, दाल और बीन्स का निर्यात रोकने का एलान किया है। इंडोनेशिया ने पाम ऑयल के निर्यात को सीमित कर दिया है। पाम ऑयल का रसोई के अलावा कॉस्मेटिक और चॉकलेट जैसे उत्पादों में भी इस्तेमाल होता है। इंडोनेशिया पाम ऑयल का सबसे बड़ा उत्पादक है। इस तरह के उत्पादक देशों के निर्यात सीमित करने का असर विश्व बाजार में महंगाई के रूप में सामने आ रहा है। रूस और बेलारुस के बाहर प्राकृतिक गैस की महंगाई का असर वहां के उवर्क कारखानों पर पड़ा है। जानकारों के मुताबिक लागत इतनी बढ़ गई है कि कारखानों को चलाना मुश्किल हो रहा है। गौरतलब है कि विश्व बाजार में यूरिया अभी करीब एक हजार डॉलर प्रति मिट्रिक टन के भाव से बिक रहा है। 2021 के आरंभ से तुलना करें, तो यह कीमत चार गुना ज्यादा है। बिना उर्वरक के कोई फसल पैदा नहीं हो सकती। तो एक बड़ा संकट सामने है।

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