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भारत-पाक: बेहतर मौका है

डा .वैदिक कॉलम
पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो जवाबी खत लिखा है, उसे देखकर मुझे लगता है कि दोनों देशों के बीच पिछले तीन साल में जो संवादहीनता पनप गई थी, अब शायद वह टूट जाए। मोदी ने शाहबाज को बधाई का जो पत्र लिखा था, उसमें यही इच्छा व्यक्त की थी कि दोनों देशों के बीच ऐसे संबंध रहने चाहिए, जिनसे दक्षिण एशिया के क्षेत्र में शांति और स्थायित्व का वातावरण बने। शाहबाज ने एक कदम आगे बढक़र कहा है कि दोनों देशों को मिलकर गरीबी और बेकारी के खिलाफ युद्ध लडऩा चाहिए।

दोनों प्रधानमंत्रियों ने एक-दूसरे को बहुत ही सराहनीय बातें कही हैं लेकिन दोनों की मजबूरियां हैं। उन्हें वे व्यक्त न करें तो दोनों देशों में उनके विरोधी उनकी जान खा जाएंगे। इसीलिए शाहबाज अपने खत में कश्मीर का मुद्दा उठाए बिना नहीं रहे और नरेंद्र मोदी आतंकवाद का! इन मुद्दों ने ही भारत-पाक संबंधों में खटास पैदा कर रखी है। इमरान खान जब सत्तारुढ़ हुए थे तो उन्होंने कहा था कि भारत-पाक संबंध सुधारने के लिए यदि भारत एक कदम आगे बढ़ाएगा तो हम दो कदम आगे बढ़ाएंगे लेकिन 2019 में पुलवामा में पाकिस्तान के हवाई हमले और भारत के बालाकोट में जवाबी हमले ने जो तनाव पैदा किया था, उसे खतरे के निशान तक पहुंचाने में कश्मीर से धारा 370 की बिदाई ने सख्त भूमिका अदा की। दोनों देशों का आपसी व्यापार ठप्प हो गया और दोनों के राजदूतावासों में आजकल उच्चायुक्त भी नहीं हैं। ऐसा लगता है कि इमरान सरकार ने 2019 में कूटनीति का मार्ग छोडक़र अपनी सेना को खुश रखने का मार्ग ज्यादा पसंद किया लेकिन शाहबाज शरीफ के नेतृत्व में बनी यह नई सरकार चाहे तो वह काम कर सकती है, जो आज तक पाकिस्तान की कोई भी सरकार नहीं कर सकी है। इस नई सरकार को सेना का भी पूरा समर्थन प्रतीत होता है।

यह तो मैं पहले ही लिख चुका हूं कि जब-जब शरीफ बंधुओं से मेरी मुलाकात हुई, शाहबाज को हमेशा मैंने ज्यादा नरम और विनम्र पाया। इसके अलावा इनके पूज्य पिता मोहम्मद शरीफ मुझे बताया करते थे कि विभाजन के बाद वे कई वर्षों तक रोज सुबह अपने गांव जाति उमरा, जो कि अमृतसर में है, जाते थे और बस में भरकर उसके मजदूरों को ले आते थे। जैसा कि आसिफ जरदारी ने कहा था, हर पाकिस्तानी की तरह, उनके दिल में भी एक हिंदुस्तान धडक़ता था। जब नरेंद्र मोदी पहली बार शपथ ले रहे थे तो प्रधानमंत्री मियां नवाज़ ने दो-तीन दिन कोई जवाब नहीं दिया तब मैंने उनके वरिष्ठ साथी सरताज अजीज को बताया कि सभी पड़ौसी देशों के प्रधानमंत्रियों को बुलाने की पेशकश मेरी ही है। उन्हें आना ही चाहिए। वे दोनों आए भी। 2014 में इस्लामाबाद में जब मियां नवाज़ से मेरी लंबी भेंट हुई तो वे यही जानना चाहते थे कि हमारे नए प्रधानमंत्री के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए क्या-क्या पहल की जाए। लेकिन अब मौका पहले से भी बढिय़ा है, जबकि दोनों देशों के संबंधों में नई शुरुआत हो सकती है।

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