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कॉर्पोरेट के मुनाफा लालच से बढ़ती महंगाई

देविंदर शर्मा
आज जबकि खुदरा मुद्रास्फीति अनुपात से बाहर होकर डोल रही है, दुनिया नया अचंभा देख रही है। यूं तो कई तरीकों से इसका पता पहले भी था, लेकिन इतने उघड़े रूप में नहीं। मुद्रास्फीति बढऩे के साथ कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा है, इस बार की वृद्धि ऐतिहासिक है। कंपनियों का फायदा बढऩे के साथ ही मुख्य कार्यकारी या शीर्ष अधिकारी अपने वेतन में भारी इजाफा, शेयरों की पुन: खरीद और लाभांश भुगतान में वृद्धि पा रहे हैं।
कंपनियां कहती हैं कि वे इस बाबत कुछ नहीं कर सकतीं, उपभोक्ता को बताया जा रहा है कि ‘असामान्य मुद्रास्फीति’ कामगारों की वेतन-वृद्धि और उत्पादन मूल्य में अनाप-शनाप इजाफे से बनी है। इससे कोई इंकार नहीं कि कोरोना महामारी ने आपूर्ति शृंखला बाधित की है, लेकिन मुद्रास्फीति में जो ऊंचा और सतत उछाल आया है, वह मांग-आपूर्ति के सरल समीकरण वाली विद्रूपता को भी झुठला रहा है। यह बताने से ज्यादा छिपा रहा है।

जनवरी माह में अमेरिका में खुदरा मुद्रास्फीति पिछले 40 सालों में सर्वोच्च यानी 7.5 फीसदी रही। यूके में यह दर पहले ही 5.4 प्रतिशत होकर पिछले 30 सालों की उच्चतम है और बैंक ऑफ इंग्लैंड ने अप्रैल तक इसे 7.1 फीसदी छूने की चेतावनी दी है। जबकि भारत में भी खुदरा मुद्रास्फीति 6.1 प्रतिशत हो चुकी है, यह डर पहले ही है कि आयात-मुद्रास्फीति से उपभोक्ता वस्तु मूल्य और ऊपर उठेंगे। आर्थिक सर्वे-2022 की चेतावनी है- ‘भारत आयात-मुद्रास्फीति, खासकर ऊर्जा के ऊंचे वैश्विक मूल्यों के दुष्प्रभावों को लेकर सचेत रहे।’
इस बीच अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य पत्रिका द फाइनेंशियल टाइम्स के 7 फरवरी अंक में एक शीर्षक ने मेरा ध्याना खींचा-‘टायसन को मुद्रास्फीति से लगाव है।’ इसने मुझे हैरान कर छोड़ा कि आज जो ऊंची मुद्रास्फीति विश्वभर में है, क्या वह बस से बाहर आर्थिक कारणों की वजह से है या फिर कॉर्पोरेट्स के लालच को मुद्रास्फीति का नया जामा पहनाकर पेश किया जा रहा रहा है।

मैं जितना ज्यादा गहरे उतरता गया, उतना साफ होता गया कि किस आसानी से लालच को मुद्रास्फीति का रूप दिया जा रहा है। यह समझने के लिए शुरुआत टायसन फूड्स से करते हैं जो कि अमेरिका के मांस बाजार के 85 फीसदी हिस्से पर काबिज 4 शीर्ष कंपनियों में एक है और जिन पर राष्ट्रपति बाइडेन ने ‘आपदा में अवसर’ पाने का इल्जाम पहले ही जड़ रखा हैं। फोर्ब्स पत्रिका के अन्य लेख के मुताबिक टायसन फूड्स ‘खर्चा कम-कमाई ज्यादा’ कर रही है। माना कि पशु-आहार और परिवहन शुल्क बढ़ा है, लेकिन यह भी तथ्य है कि टायसन फूड्स का परिचालन मुनाफा अंतर महामारी से पहले के मुकाबले दोगुणा हो गया है। जहां चारों पशु-मांस उत्पादक कंपनियों के शुद्ध लाभ ने 300 फीसदी की छलांग लगाई है वहीं खुदरा मांस मूल्य में भारी बढ़ोतरी हुई है, बीफ में यह इजाफा अमूमन 20 प्रतिशत हुआ। जबकि कंपनियों द्वारा पशुपालक को जंतु का देय-मूल्य पिछले 50 सालों में न्यूनतम है।
यदि आप बीयर पीते हैं तो यहां कुछ बुरी खबर है। गार्जियन अखबार का लेख बताता है कि यूरोप में लोकप्रिय ब्रांड हेनेकेन बीयर बिक्री में 4.3 फीसदी इजाफा हुआ, जिससे सकल लाभ 80 फीसदी दर्ज हुआ। साल 2021 में मुनाफा रिकॉर्ड 2.26 बिलियन डॉलर रहा, तथापि कंपनी ने आगामी महीनों में मूल्य-वृद्धि की घोषणा की है। हालांकि, महामारी के पिछले 2 सालों के दौरान बीयर की कीमतें कई बार बढ़ाई हैं। इसी बीच कोबरा नामक अन्य लोकप्रिय बीयर ब्रांड ने भी उत्पादन मूल्य में वृद्धि होने का वास्ता देकर उपभोक्ता से अधिक दाम चुकाने को तैयार रहने को कहा है।

अब बात स्टारबक्स कंपनी की। जाहिर है यह केवल कॉफी न होकर, अहसास है, जिसकी कीमत आप अदा करते हैं। पिछले साल आखिरी तिमाही में कंपनी मुनाफे में 31 प्रतिशत वृद्धि हुई। वर्ष 2021 में स्टारबक्स अपनी आमदनी 8.1 बिलियन डॉलर से ज्यादा रहने के बावजूद मूल्य बढ़ाना चाहती है। रोचक यह कि कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का वेतन-भत्ता 39 प्रतिशत इजाफे के साथ कुल मिलाकर 2.4 करोड़ डॉलर हो गया तो वहीं दुनियाभर के कॉफी उत्पादक किसान न्यूनतम आय वर्ग में आते हैं। पर कॉफी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों का वेतन और बोनस असीमित है। यह लाभ का निजीकरण और लागत का सामाजिक-करण करने जैसा है।
सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने अपने ट्वीट में अन्य उदाहरण में कहा- ‘कॉर्पोरेट्स लालच का आलम यह कि चिपोट्ले (मैस्किन रेस्त्रां चेन) का मुनाफा गत वर्ष की तुलना में 181 प्रतिशत वृद्धि पाकर 76.4 करोड़ डॉलर हो गया और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की तनख्वाह 2020 की बनिस्बत 137 फीसदी बढ़ाकर 3.8 करोड़ डॉलर कर दी गई, तुर्रा यह कि कंपनी बुर्रीटो व्यंजन का दाम बढ़ाने के पीछे कारण सबसे छोटे कर्मी के वेतन में 50 सेंट की बढ़ोतरी ठहरा रही है। यह मुद्रास्फीति नहीं बल्कि ‘मूल्य-चक्रवृद्धि’ है’।

सिएट्ल स्थित क्रेडिट कार्ड प्रोसेसिंग कंपनी ग्रैविटी पेमेंट के संस्थापक डैन प्राइस ने अपने ट्वीट में न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट का हवाला देकर कहा, ‘किराना वस्तुएं इतनी महंगी क्यों हैं? क्रोगर (अमेरिकी खुदरा वस्तु कंपनी) का मुनाफा रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। स्टॉक मूल्य में गत एक साल में 36 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई। मुख्य कार्यकारी अधिकारी का वेतन 45 फीसदी बढ़ोतरी के साथ 2.2 करोड़ डॉलर हो गया, जो कि एक मध्यम दर्जा कर्मी से 909 गुणा ज्यादा है। इस कंपनी के 75 फीसदी कर्मचारी भोजन-असुरक्षा से जूझ रहे हैं और 63 प्रतिशत अपने मासिक बिल चुकाने में असमर्थ हैं। बहुत से पेट भरने हेतु सरकारी सस्ती दर भोजन-कूपनों पर निर्भर हैं।’
सरल शब्दों में, कॉर्पोरेट्स के दिन इतने अच्छे दिन कभी न थे। रोजमर्रा का किराना हो या कॉफी, उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर ईंधन तक, नेटफ्लिक्स और अमेज़ॉन प्राइम तक ने अपने मुनाफे में भारी बढ़ोतरी और न्यूनतम कर अदायगी के बावजूद शुल्क बढ़ा दिया है। बात ईंधन की करें तो मुख्य तेल कंपनियों- एक्सॉन मोबिल, ब्रिटिश पेट्रोलियम, शैल और शैवरोन- को पिछले 7 सालों में सबसे ज्यादा मुनाफा हुआ है, फिर भी कंपनियां उपभोक्ता से जो दाम डीज़ल-पेट्रोल के लिए वसूल रही हैं, उसे कम करने की बात आए तो खुद को असहाय बताती हैं।

हैरानी की बात है कि रिपोर्ट्स बताती हैं कि लागत मूल्य में वृद्धि के बावजूद वर्ष 2021 की दूसरी तिमाही में अमेरिकी कॉर्पोरेट्स का मुनाफा बढक़र रिकार्ड 2.8 ट्रिलियन डॉलर रहा। इसी तरह भारत में भी कॉर्पोरेट्स का लाभ बढ़ा। लेकिन जहां कामगार और गरीब वर्ग को बढ़ती मुद्रास्फीति की मार सहनी पड़ रही है, वहीं चोटी के 1 फीसदी अमीरों को इसका फायदा हो रहा है। इस साल लक्जरी नौका (याच) की बिक्री में 77 प्रतिशत का भारी उछाल आया है। फिर भी बाजार अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मुद्रास्फीति और कॉर्पोरेट्स लालच के बीच कोई संबंध निकालना पसंद नहीं करेगा, इस पर हमें और ज्यादा हैरानी नहीं होनी चाहिए।
लेखक खाद्य एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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