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इंदौर का ऐसा एसटीपी जिसमें केंचुए करते हैं पानी साफ

इंदौर। स्वच्छता में नई इबारत लिख चुके इंदौर शहर में एक सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में गंदे पानी को साफ करने के लिए प्राकृतिक तरीकों का उपयोग किया जा रहा है। पीपल्याहाना चौराहे पर बनाए गए एसटीपी में गंदे पानी को साफ करने के लिए केंचुए की मदद ली जा रही है। इसके अलावा पानी को लकड़ी का बुरादा, पत्थर और बैक्टीरिया की मदद से पूरी तरह साफ कर दिया जाता है। इस पानी को पीपल्याहाना तालाब में छोड़ दिया जाता है। केवल दो घंटे में 350 किलो लीटर (केएलडी) प्रतिदिन पानी साफ हो जाता है। प्लांट के संचालन पर करीब दो लाख रुपए प्रतिमाह खर्च होते हैं।

इस तरह का नवाचार करने वाला यह प्रदेश का एकमात्र एसटीपी है। शहर में 11 एसटीपी संचालित हो रहे हैं, लेकिन पीपल्याहाना चौराहे पर बनाए गए एसटीपी को अलग तकनीक से बनाया गया है। इसमें दूषित पानी को साफ करने के लिए एडवांस ग्रोथ बायोलाजिकल रिसर्कुलेटिंग रिएक्टर की सहायता ली जा रही है। नगर निगम के कार्यपालन यंत्री सुनील गुप्ता के अनुसार इस प्लांट को 15 हजार वर्गफिट में तीन मंजिला बनाया गया है। यह मुख्यत: सिंगापुर की एक कंपनी की तकनीक है। उसकी सहायता से इसे स्थापित किया गया है। इसकी लागत एक करोड़ 95 लाख रुपये है। इस प्लांट में पीपल्याहाना इलाके की करीब 60 कालोनियों का सीवरेज आता है। उपयंत्री आकाश जैन के अनुसार कालोनियों से आने वाला गंदा पानी एक बड़े टैंक में भरता है। वहां ऐसे अपशिष्ट पदार्थ अलग किए जाते हैं जो उपचारित नहीं किए जा सकते। फिर इस मलयुक्त पानी को एक बड़े टैंक में डाल कर उसमें से स्लज को निकाल लिया जाता है। इसके बाद निकले पानी को केंचुए वाले प्लांट में डाला जाता है। यहां से निकले पानी को बैक्टीरिया वाले प्लांट में डाला जाता है।

यहां पर ऊपरी सताह में एक से तीन इंच तक के पत्थर रखे गए हैं, जिन पर बैक्टीरिया डाले गए। यहां तक आते-आते पानी का 80 प्रतिशत हिस्सा साफ हो जाता है। इसके बाद पानी दूसरे टैंक में जाता है। यहां से प्रेशर टैंक और फिर कार्बन फिल्टर में जाता है। अंत में अल्ट्रा फिल्ट्रेशन टैंक है, जिसमें अल्ट्रा वायलेट किरणों से पानी साफ हो जाता है। इस साफ पानी को तालाब में छोड़ा जाता है। केंचुए का मल, लकड़ी के बुरादे के साथ मलाकर बनता है खाद – 400 वर्ग फीट के प्लांट में कंचुए रखे गए हैं। इसमें नीचे पानी के पाइप डाले गए हैं और ऊपर लकड़ी का बुरादा डाला गया है, जिस पर केंचुओं को छोड़ा गया है। यहां पर आने वाले मलयुक्त पानी को स्पिक्रंलर की सहायता से छोड़ा जाता है। केंचुए इसमें मौजूद कार्बन पार्टिकल्स को खा लेते हैं और वे मल करते हैं, यह लकड़ी के बुरादे के साथ मिल जाता है। टैंक में डिस्क फिल्टर (जालियां) लगी हैं, जो केंचुए के मल और बुरादे को नीचे नहीं जाने देती, जबकि पानी छन कर निकल जाता है। टैंक का संचालन करने वाली एजेंसी के कर्ताधर्ता नोनित लुहाडिय़ा के अनुसार सालभर में एक फीट मोटी परत जालियों पर जम जाती है। जिसे हम निकाल कर सुखाते हैं और थोड़े समय बाद यह खाद में तब्दील हो जाती है।

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