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आफत से राहत में नयी कार्य संस्कृति

सुरेश सेठ

विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना की तीसरी लहर का दबाव लगभग खत्म हो चुका है। जहां देशभर में प्रतिदिन लाखों की संख्या में संक्रमण के मामलों की रपट हो रही थी, वहीं अब वह कुछ हजार तक पहुंच गयी है। इस तीसरी लहर में मृत्यु की दर कम रही और संक्रमित लोगों को अस्पताल जाने की जरूरत भी कम पड़ी। देश में रिकार्ड स्तर पर टीकाकरण अभियान चला, देखते ही देखते एक सौ अस्सी करोड़ टीकों की खुराक लोगों को लगा दी गयी। पंद्रह से अठारह आयु वर्ग के किशोरों को टीका लगाने का फैसला हुआ और रिकार्ड समय में उनको भी पहली डोज़ लगा दी गयी।
अब बारह से पंद्रह वर्ष की आयु के किशोरों को भी टीका लगाने का निर्णय ले लिया गया है। संतोष की बात है कि भारतीय टीके ‘कोवैक्सीन’ से लेकर ‘कोवावैक्स’ तक को अमेरिकी मार्डना और फाइजर से किसी भी दृष्टि से कम नहीं पाया गया बल्कि लागत और आसानी से सुरक्षित रख सकने के गुण के कारण इन टीकों की मांग भी ब्रिटेन और अमेरिका के टीकों से कम नहीं है। प्रशासन को गर्व है कि देश में टीकाकरण का यह अभियान रिकार्ड स्तर पर चला, इसीलिए तीसरी लहर के डेल्टा प्लस और ओमीक्रोन के मिले-जुले परन्तु त्वरित प्रभाव से हमें इतनी जल्दी निजात मिल गयी।

अब यह भी सोचा जा रहा है कि अगर टीकाकरण का अिभयान उसी तेजी से चलता रहता है, लोग शारीरिक अंतर रखने और चेहरे पर मास्क पहनने को एक स्वाभाविक आदत बना लेते हैं तो यह महामारी उन मारक तेवरोंं के साथ फिर देश में प्रकट नहीं होगी, जिस प्रकार पिछले दो वर्ष देश इसे झेलता रहा है। इसके साथ ही यह खबर आ रही है कि अभी तक अपने देश में लगाये जाने वाले टीके कोरोना निरोधी थे, ये रोगी और संक्रमित की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देते थे। जरूरत महसूस की जा रही थी कि हमारा फार्मा उद्योग ऐसे कोरोना उन्मूलक टीके भी बनाये, जो इसके रूप बदलते वायरस को जड़ से पकड़ उखाड़ फेंकें, तािक इस देश की श्रम शक्ति और इसके कामकाजी लोग अवसादग्रस्त होकर हताशा के अंधड़ में चकराते न फिरें, या अपना देश छोडक़र विदेशों की ओर पलायन का रुख न अपनायें। दो वर्ष का कोरोना ग्रस्त समय जो इस धरती के लोगों पर गुजरा, वह आर्थिक आपदा का समय था। इसमें महंगाई ने डॉ. मनमोहन सिंह काल की बुलन्दियों को फिर छुआ। बेकारों की संख्या में इतनी आश्चर्यजनक वृद्धि हुई कि जो पिछले पैंतालीस साल में नहीं देखी गयी थी।

इसमें आर्थिक पाबन्दियों के कारण लकवाग्रस्त निवेश, व्यवसाय, उत्पादन ने मेहनती मजदूरों को उनकी महानगरीय जड़ों से उखाड़ अपनी जड़ों अर्थात अपने ग्रामीण अंचलों में वापस जाने पर विवश कर दिया जहां अधिकांश किसान आज भी दो एकड़ से पांच एकड़ तक की सीमा में खेती करते हैं और मुश्किल से अपनी गुजर-बसर करते हैं। अब इनमें आ जुड़ा उनके परिवारों का वह अंश जो वैकल्पिक रोजगार की तलाश में महानगरों में जा बसा था या जिसने विदेशों का रुख किया था। अब कोरोना वायरस का यह तूफान तो विश्वव्यापी था। इस कारण देश की धरती के बेटे विदेशों से लौट रहे थे और महानगरों में वैकल्पिक रोजगार तलाश रहे थे, ठिकाना ढूंढऩे गये लोग अब अपने गांव-घरों की ओर लौट रहे थे।
स्थिति बदलती न देख, कोरोना की एक लहर से दूसरी, तीसरी और अब चौथी के आने की आशंका बताने वालों की कमी नहीं है। इसीलिए यह श्रम शक्ति अब फिर महानगरों की ओर जाने या प्रवासी बनने के लिए तैयार नहीं हो रही। आंकड़े चौंकाते हैं कि जितना उखड़े हुए शरणार्थियों का पलायन भारत विभाजन के समय हुआ था उससे कहीं अधिक इस कोरोना की मारक लहरों की दहशत ने कर दिया।

लोग गांवों में लौटने के बाद वहां से जाने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। सरकार ने वचन दिया कि उनके लिए उनके गांवों और इर्दगिर्द के कस्बों में लघु, कुटीर और मध्यम दर्जे के उद्योगों की कायापलट से यह संभव किया जायेगा। तब दो आर्थिक बूस्टर दिये और स्िकल्ड भारत अभियान से हर वर्ष दो लाख नये रोजगार पैदा करने की घोषणा की गई, लेकिन वह अब तक कुछ हजारों तक क्यों सिमट गया
देश के ग्रामीण समाज में लघु और कुटीर उद्योगों की नयी दुनिया बसाने की बातें बहुत हुईं, लेकिन यह दुनिया क्यों हवाई रही गांव-घरों के पास विकसित होती नजर क्यों नहीं आयी कहां तो कुशल भारत साढ़े पांच करोड़ को रोजगार देने के वादे कर रहा था और कहां वहां उखड़े हुए लोगों के दबाव के कारण अब करोड़ों लोग रोजगार तलाशते नजर आने लगे। लघु और कुटीर उद्योगों का विकास तो इस वर्ष वित्तमंत्री निर्मला के बजट में भी घोषित हुआ है। लेकिन लाल डोरा क्षेत्रों में धन कुबेरों को भी निवेश की इजाजत मिल जाने के बाद एक नया संकट पैदा होता नजर आने लगा। स्टार्टअप उद्योगों की योजना सिर नहीं उठा रही और निजीकरण के प्रति योजनाबंदी के समर्पित हो जाने के कारण अब रोजगार मेले भी उन्हीं को समर्पित होते नजर आ रहे हैं।

कोरोना के विदा लेने के माहौल के साथ आम आदमी के निर्जीव चेहरों पर जो रौनक लौटनी चाहिए थी, वह क्यों नहीं आ पायी ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के नौजवान अपनी शिक्षा को रोजगार उन्मुख न पा फिर विदेशों का रुख कर रहे हैं। इस समय कोरोना का प्रभाव विश्वव्यापी घटा है और देश के युवा श्रम को परायी धरती फिर लुभाने लगी है। विश्वविद्यालयों में शोध और कला संकाय सूने पड़े हैं और आइलेट अकादमियों का बोलबाला हो रहा है।
नौजवान अपने परीक्षा परिणामों में ऊंचे से ऊंचा प्रतिशत लाने के बारे में नहीं सोचते, बल्कि इस देश से पलायन के लिए अपेक्षित बैंड बटोरने की बात कहते हैं। अध्यापक, मार्गदर्शक और गुरु की महत्ता कम होने लगी है। चुस्त-दुरुस्त जनसंपर्क अधिकारी चैनलों में नजर आते हैं, जो कम बैंडों के साथ विदेशी धरती पर उतर सकने के शॉर्ट कट बताते हैं।
कोरोना के इन दो वर्षों ने देश की युवा पीढ़ी को अवसाद दिया या इस माहौल से पलायन वाद की उत्कट इच्छा। अब जब माहौल के सामान्य हो जाने की उद्घोषणा सरकारी ही नहीं, सार्वजनिक स्तर पर भी हो रही है, अपनी धरती पर जीते-मरते हुए श्रम की महत्ता को फिर से स्थापित किया जाना चाहिए।

लेकिन विडंबना यह है कि इस प्रेरणा के पुनर्जागरण के स्थान पर राहत और रियायत संस्कृति ने जन्म ले लिया है। नवनिर्माण के कठिन रास्ते को अपनाने के स्थान पर चोर दरवाजा संस्कृति ने जन्म ले लिया है। यह संस्कृति अध्यवास, शोध और नयी जमीन तोडऩे वाली पुस्तक संस्कृति के बल पर आगे नहीं बढऩा चाहती, बल्कि उसके स्थान पर ऐसी संस्कृति उभर रही है, जो संपर्क, परिवारवाद या हथेलियों पर सरसों जमाने का दम भरती है।
यह भारत जैसे उभरते और संवरते देश के लिये एक ऐसा दुखद परिवर्तन है कि जहां देश की युवा शक्ति अपनी जमीन पर खड़े हो, निर्माण के लिये डटने के स्थान पर इस धरती से प्रवासी हो अजनबी धरती पर अपने सपनों के गांव बसाना चाहती है। पलायन के यह चोर मार्ग बंद हों। शिक्षा की रीति-नीति बदलकर उसे व्यावहारिक तेवर दिया जाये। मृत होते मूल्यों की जगह नैतिक मूल्यों का आधिर्भाव और राष्ट्र निर्माण का वैकल्पिक संसार पुन: उदय हो। राष्ट्र के कर्णधारों का दायित्व इस माहौल को बनाने में कम नहीं। क्या आपाधापी के इस दौर में उनसे यह उम्मीद की जा सकती है

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